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अमरोहा बना नर्सरी का सबसे बड़ा गढ़, किसानों ने दिया हजारों मजदूरों को रोजगार, लोगों ने सुधारी आर्थिक स्थिति

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कई गांव के किसानों से परंपरागत खेती के साथ शुरू किया नर्सरी का कारोबार, हजारो ग्रामीण को मिला रोजगार

लखनऊ। अमरोहा के दर्जन भर गाँवों के किसान परंपरागत खेती छोड़ नर्सरी का कारोबार कर रहे हैं। नर्सरी के कारोबार से क्षेत्र के करीब तीन हजार ग्रामीणों को रोजगार मिल रहा है, जिसके कारण पलायन रुक गया है। लोगों को गाँवों में ही पूरे साल भर रोजगार मुहैया हो रहा है। एक हजार नर्सरी में विकसित पौधे एनसीआर समेत कई राज्यों में सप्लाई हो रहे हैं।

नर्सरी का कारोबार करने वाले साहिल ने बताया,” कि हमारे यहाँ से तैयार पौधे एनसीआर समेत राजस्थान, पंजाब, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, और गुजरात में सप्लाई होते हैं। लखनऊ स्थित जनेश्वर मिश्र पार्क में हमारे यहां से ही पौधे गए हैं। रीवर फ्रंट की खूबसूरती भी हमारे यहाँ की नर्सरी में तैयार पौधे ही बड़ा रहे हैं। देश के बड़े-बड़े दफ्तरों, फार्म हाउस और पार्कों में अमरोहा से ही पौधे जाते हैं। कुछ बाहरी देशों से भी ऑर्डर आ रहे हैं। हसनपुर से रोज कई ट्रक नर्सरी के पौधे सप्लाई होते हैं।”

तहसील हसनपुर क्षेत्र के सिहाली जागीर गांव के नर्सरी कारोबारी शरद कुमार ने बताया,” कि मैं बर्ष 1993 से नर्सरी का कारोबार कर रहा हूँ। लेकिन इससे पहले मैं गेहूं और चने की खेती करता था, इसमें मुनाफा अधिक नहीं होता था। हमारे गांव से शुरू हुआ नर्सरी का कारोबार सहसौली, मनौटा, सेमली, सैमला, आलमपुर, वसीकला, मछरई समेत कई गाँवों में फ़ैल गया है। यहां के दर्जनों किसान परम्परागत खेती के आलावा नर्सरी के कारोबार से जुड़ गए हैं।”

नर्सरी के कारोबार से जुड़े सुहैल ने बताया,” सिहाली जागीर गांव के करीब 200 लोग नर्सरी का कारोबार करते हैं। ऐसे में हम लोगों को मजदूरों की जरुरत होती है। और पास के गांव से मजदूर मिल जाते हैं। इस तरह से मजदूरों को पुरे साल का रोजगार मिल जाता है, जिससे गरीब लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुधर जाती है। कुछ नर्सरी मालिक दिहाड़ी के हिसाव से मजदूरी कराते हैं। कुछ मालिक अपने काम को ठेके पर दे देते हैं।

इन पौधों की नर्सरी लगती है, अगाला, ओनिमा, अम्ब्रेला पाम, देफेनबेकिया,कैलैडियम, सुदर्शन, कोचिया, नीबू घास, केवाच, मनी प्लांट, क्रोटन, फर्न, कोलिअस, तुलसी, ऐमरानथास, कैक्टस, केलेदुला, गेंदा, गुलदाउदी, जेरेनियम, गुलाब, गुड़हल, कंटीली चंपा, बेला, और खजूर आदि होते हैं।

नर्सरी में मजदूरी करने वाले महाबीर ने बताया,” कि पहले मैं दिल्ली में रहकर मजदूरी करता था। लेकिन ज्यादा काम नहीं मिलता था। जब खेतों में कटाई और बुआई का समय आता था तो वापस आना पड़ता था। ऐसे में बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता था। लेकिन अब मैं नर्सरी में काम करता हूँ। और मुझे यहां पूरे साल भर काम मिलता है। रोज शाम को जाते समय मजदूरी के पैसे भी मिल जाते हैं। मेरे परिवार के कई लोग ऐसी तरीके से नर्सरी में काम करते हैं।”

इन गाँवों में नर्सरी की बिभिन्न प्रकार की प्रजातियाँ तैयार की जातीं हैं। तैयार करके दिल्ली एनसीआर सहित बिभिन्न शहरों में भेजी जातीं हैं। नर्सरी का कारोबार बारहमासी हैं। और हर मौसम में पौधों की बिक्री चलती रहती है। इसी तरीके से मजदूरों को भी साल भर तक काम मिलता रहता है।

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Vandana Singh

वंदना सिंह को पत्रकारिता का 10 साल का अनुभव है

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