अदरक से कम लागत में कमाएं लाखों रुपये कैसे और किस तरह की जमीन पर करें अदरक की खेती

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अगर आप अदरक की खेती करना चाहते हैं तो आपको बहुत ही फायदा हो सकता है। क्योंकि इसकी खेती में कम खर्च में अधिक पैदावार होती है। अदरक की खेती को अगर कृषि वैज्ञानिकों द्वारा बताये गए तरीकों से किया जाये तो किसानों को फसल की प्राप्ति और अधिक हो सकती है। अदरक के तीन किस्म ऐसे हैं जो हमारे देश में भली भांति की जाती है एक सुप्रभात दूसरा सुरुचि और तीसरा सुरभी है अब हम जानते है कि अदरक की खेती कैसे की जाती है।कैसे करें अदरक की खेती
जैसा हम सभी जानते हैं कि अदरक एक फायदे बाली फसल है। इसका प्रयोग हर घर में होता है। इस फसल को हम वैज्ञानिक तरीके से भी कर सकते है जिसका हम फार्मिंग का भी रूप दे सकता हूँ।

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अदरक के लिए भूमि का चयन और तैयारी
किसान चाहे तो अदरक कि खेती किसी भी तरह की भूमि पर कर सकते है। लेकिन आजकल उचित जल निकास वाली दोमट भूमि में अदरक की खेती को सबसे सर्वोत्तम मनन जाता है। मांदा का निर्माण करना भी अदरक की खेती के लिए अच्छा होता है। मादा निर्माण से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई कर के उसे भुरभुरा बना नैना चहिये। अदरक की खेती को खरपतबार रहित रखने के लिए मिटटी को नरम बनाये रखने के लिए आवश्यकता अनुसार खेत की जुताई करते रहना चाहिए।जलवायु
कृषि बैज्ञानिकों द्वारा अदरक की खेती ऐसी जगह पर करना चाहिए जहाँ नर्म वातावरण हो। फसल के विकास के समय 50 से 60 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा हो साथ ही भूमि ऐसी होनी चाहिए जहां पानी न ठहरे और हलकी छाया भी बानी रहे।

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बीज की बुआई

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बीज कंदों को बोन से पहले 0 .25 प्रतिशत इथेन,45 प्रतिशत एम और 0 .1 प्रतिशत बाविस्टोन के मिश्रण घोल में लगभग एक घंटे तक डुबाये रखना चाहिए। फिर दो से तीन दिनों तक इसे छाया में ही सूखने दें। जब बीज अच्छे से सूख जाये तो उसे लगभग 4 सेंटीमीटर गहरा गड्ढा खोद के बो देना चाहिए।

बीज बोते समय कतार से कतार की दुरी कम से कम 25 से 30 सेंटीमीटर और पौधों से पौधों की दूरी लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर होनी चाहिए । बीज के बुआई के तुरंत बाद उसके ऊपर से घास फूंस पत्तियों और गोबर की खाद को डाल कर उसे अच्छे से ढक देना चाहिए इससे मिटटी के अंदर नमी बनाये रखना आसान होता है साथ ही अदरक के अंकुरन तेज धुप से बच सकते हैं।सिंचाई / जल प्रबंधन
अदरक की खेती में बराबर नमी का बना रहना बहुत जरुरी होता है इसलिए इसकी खेती में पहली सिंचाई बुआई के तुरंत बाद कर देनी चाहिए। सिंचाई के लिए टपक पद्धति या ड्रिप एरिगेशन का प्रयोग किया जाये तो और भी बेहतर परिणाम सामने आता है।

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खाद प्रबंधन
अदरक की खेती में मिटटी की जाँच करने के बाद ही पता लगता है की कब और कितना खाद का प्रयोग करना चाहिए। अगर मिटटी की जाँच न भी की जाये तो भी गोबर की खाद या कम्पोस्ट 20 से 25 टन, नाइट्रोजन 100 किग्राम,75 किलोग्राम फास्फोरस,और साथ ही साथ में 100 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से देनी चाहिए। इस खाद को देने के लिए, आप चाहें तो गोबर या कम्पोस्ट को भूमि की तयारी से थोड़े पहले खेत में सामान्य रूप से डाल कर अच्छे से खेत की जुताई करनी चाहिए।
नाइट्रोजन ,फास्फोरस और पोटाश की आधी मात्रा बीज की बुआई के समय देना चाहिए और बाकी आधी को बुआई के कम से कम 50 से 60 दिनों के बाद खेत में डाल कर मिटटी चढ़ा देना चाहिए। रोग नियंत्रण
अदरक की खेती को प्रभावित करने बाले दो रोग होते हैं
(1)मृदु विगलन
(2)प्रखन्ध विगलन इन रोगों के प्रकोप से पौधों के नीचे की पत्तियां पीली पड़ जातीं हैं। और बाद में पूरा पौधा पीला होकर मुरझा जाता है साथ ही भूमि के समीप का भाग पनीला और कोमल हो जाता है। पौधा को खींचने पर वो प्रखंड से जुड़ा स्थान से सरलता से टूट जाता है। बाद में धीरे -धीरे पूरा प्रखंड सड़ जाता है

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मृदु विगलन रोग से बचाव के लिए भूमि में चेस्टनट कम्पाउण्ड के 0.6 प्रतिशत घोल को आधा लीटर प्रति पौधे की दर से देते रहना चाहिए।
कुछ रोग ऐसे भी होते है जिसकी बजह से पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते हैं जो कि बाद में आपस में मिल जाते हैं। इस रोग की बजह से पौधों की वृद्धि पर प्रभाव पड़ता है जिससे उपज कम हो जाती है। इस रोग से बचने कि लिए बोर्डो मिश्रण का उपयोग 5:5:50 के अनुपात में किया जाना चाहिए।

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