धान रोपण की इस अनोखी तकनीक से विहार के किसान ने तोडा वर्ल्ड रिकॉड

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भारत में खेती आमतौर पर अपनी फसलों की सिचाई के लिए हमेशा मानसून पर निर्भर रहती है लेकिन भारत में सबसे पिछड़े माने जाने बाले विहार के एक किसान सुमंत कुमार ने तमाम परिस्थितियां झेलने के बावजूद धान की पैदावार में सारे रिकार्ड तोड़े।


विहार के नालंदा जिले में एक छोटे से दूरवर्ती गांव दरवेशपुरा जहां आज भी विजली की बहुत परेशानी है ऐसी स्थिति में अपने परिवार के साथ रहते हैं।
युवा किसान सुमंत कुमार ने आश्चर्यजनक रूप से 22.4 टन धान की पैदावार लेकर चीन के कृषि वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग के 19.4 टन के रिकार्ड को चकनाचूर कर दिया। किसान सुमंत कुमार की इस सफलता के पीछे मुख्य रूप से जैविक खाद (गोबर खाद) और सही एवं उचित अनुपात में खाद के प्रयोग का बड़ा हाथ है।
भारत में जैविक खाद का प्रयोग लगभग हजार साल पुराना है। भारत में पारम्परिक तौर तरीके से जैविक खाद से खेती होती रही हैं और आज भी भारतीय किसान जानवरों के गोबर से जैविक खाद बनाकर खेतों में डाल रहे हैं। और फसल अच्छी होने के कारण अच्छा लाभ कमा रहे हैं।
भारत में रासायनिक खाद का इस्तेमाल साठ दशक के उत्तरार्ध में उस वक्त शुरू हुआ, जब बढ़ती हुई आबादी विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा। उस समय आबादी की जरुरत के हिसाब से उत्पादन को तेजी से बढ़ाने के लिए कृषि क्षेत्र में जैविक खाद की जगह पर रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। लेकिन समय के चलते हुए रासायनिक खाद पर हम पूरी तरह निर्भर हो गए। और इसीलिए देश की मिटटी की उर्वरता में तेजी से कमी आई। रासायनिक खादों व कीटनाशक दवाओं से लोगों में तरह-तरह की बीमारियां फैलने लगी। लेकिन अब किसान धीरे-धीरे जैविक प्रणाली की ओर लौट रहे हैं सुमंत कुमार जैविक खेती की इन्हीं सफलताओं में से एक नायक हैं।विहार प्रदेश के कृषि विश्वविद्यालय अब भी सुमंत की इस सफलता पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन राज्य के कृषि प्रमुख ने सुमंत की फसल का सत्यापन कर उनकी सफलता पर मोहर लगाई । तभी सुमंत कुमार के यहां खेती के बारे में पूछने व बधाई देने के लिए राज्य भर से लोगों के आने का तांता लग गया।
देश की संसद ने उनको गांव में एक बैंक की शाखा खोलकर,गांव में बिजली पहुंचाकर,गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए एक कंक्रीट पुल बनवाकर उनकी इस सफलता को मान्यता दी। सुमंत कुमार की अपनी सफलता की ये गाथा वाक़ियों के साथ बाँटने के लिए जगह – जगह के लोगों ने सम्मलेन करने के लिए उनको आमत्रित किया। सुमंत के नक़्शे कदम पर चलते हुए उनके ही गांव बालों ओर दोस्तों ने उनकी सफलता की इस कहानी को और आगे बढ़ाते हुए सत्रह टन धान उत्पादन का रिकॉर्ड हांसिल किया।
धान उत्पादन में आई इस क्रांति के पीछे गोबर खाद या जैविक खाद का बड़ा हाथ है। पारम्परिक तौर पर धान की तीन सप्ताह पुराने बीज की तीन या चार के समूह बुआई की बजाय, दरवेशपुरा के किसानों ने तकरीवन आधे बीजों को पहले विकसित किया और एक-एक करके उनकी खेतों में बुआई की। बड़ी सावधानी से धान के इन बीजों की खेती में 25 सेंटीमीटर की दुरी पर ग्रिड पैटर्न के आधार पर मिटटी को सुखाकर निराई के बाद बुआई की गई। ताकि हवा इनकी जड़ों तक आराम से पहुँच जाये।
धान उपजाने के लिए दरवेशपुरा के किसानों ने जिस पद्धति का प्रयोग किया उसे फ्रांस के जेसुइट पादरी फादर हेनरेड द लॉलाने ने ”धान की गहन प्रणाली” के रूप में 1983 में विकसित किया था। स्थानीय किसानों की मदद के लिए बिभिन्न प्रयोगों के बाद उन्होंने ये तरीका विकसित किया था। विहार सरकार में सेवानिवृत के बाद भी काम कर रहे श्री राजीव कुमार ने ‘ कम में ज्यादा ‘ की ये तकनीक कृषि विशेषज्ञ अनिल कुमार को सिखाई जिसे बाद में उन्होंने भारत के सैकड़ों ग्रामों तक पहुँचाया।
हमारा मानना है कि सभी किसान खेती में जैविक खाद पदार्थों का ही प्रयोग करें। नियम अनुसार खाद व् पानी का प्रयोग करें, जैविक खाद को
अच्छे से मिश्रण बनायें और अपने खेतों में समय से फैलाएं।

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