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अगर किसान हुआ नाराज तो बड़े-बड़े उद्योगपतियों का खजाना हो सकता है खाली, आंकड़ों में देखिए ग्रामीण भारत की ताकत

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भारत के अन्नदाता यानी की किसानों ने एक ऐसा निर्णया लिया है जो भारत के इतिहास में कभी भी नहीं लिया गया होगा। ऐसा कहा जाता है कि मां और किसान कभी भी छुट्टी पर नहीं होते हैं। लेकिन भारत के किसान अब जल्द ही छुट्टी पर जाने वाले है। इस आन्दोलन के जरिए किसान अपना महत्व बाजार से कुछ भी नहीं खरीदकर दिखाने वाले हैं।

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ग्रामीण बाजार देश के लिए महत्वपूर्ण

भारत में कुल 6.5 लाख गांव हैं जिनमें तकरीबन 85 करोड़ लोग रहते है। इस हिसाब से देश की आबादी का कुल 70 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है। जो कि देश में बाजार की नजर में बहुत अहमियत रखता है। वहीं एक आंकड़ा कहता है कि 2025 तक अकेला ग्रामीण बाजार जो होगा वो 15-16 लाख करोड़ रुपयों का होगा।

आने वाले सालों में ट्रैक्टर, विद्युत, बीमा के बाजार में आएगी भारी उछाल

साल 2025 तक ट्रैक्टर बाजार करीब 30 से 40 हजार करोड़ का होने का अनुमान हो और वहीं करीब एक लाख करोड़ का मोटर साइकिल और गाड़ी का ग्रामीण बाजार होने की संभावना है।

अगर विद्युत सम्बंधित उपकरणों की बात करें तो साल 2022 तक 25 से 30 लाख करोड़ का ये बाजार होने वाला है, जिसमें ग्रामीण बाजार की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी होगी जबकि शहरी बाजार में स्थिरता रहेगी।

बीमा बाजार में साल 2020 तक 20 से 25 लाख करोड़ होने का अंदाजा लगाया जा सकता है। ग्रामीण बाजार इस क्षेत्र के लिए वरदान साबित होने वाला है। गौरतलब है कि अभी बीमा की प्रीमियम से कम्पनियों को एक लाख करोड़ की कमाई होती हैं। जो कि आगे चलकर गांव में बढेगा तो ये दोगुने से तीन गुना होने की सम्भावना मानी जा रही है।

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हेल्थ केयर का बाजार भी साल 2020 तक 20 लाख करोड़ हो सकता है। जिसमे सबसे बड़ा योगदान ग्रामीण भारत का ही होगा। अगर इस बाजार में किसान अपने उपभोक्ता होने का आभास करा देने में सफल होते हैं तो सभी का ध्यान किसानों की समस्या पर केंदित होगा। कार्पोरेट बाजार कभी भी अपने उपभोक्ता खत्म नहीं करना चाहेगा।

 

आज देश के 650 जिलो में से 500 जिलो के बाजार गांव पर आधारित

आज देश में अनाज का 270 मिलियन टन उत्पादन होता है और करीब 250 मिलियन टन का बाकी फसलों का उत्पादन होता है, जबकि 150 मिलियन टन दूध का उत्पादन होता हैं। ये सभी उत्पादन देश अर्थव्यवस्था को करीब 30 से 40 लाख करोड़ रुपयों का व्यापार देते है। अगर इतने बड़े बाजार का प्राइमरी सामान बाजार में ही नहीं जायेगा तो डिमांड और सप्लाई का अंतर बढ़ जाएगा और जो किसानों की फसलों की वास्तविक मूल्य का निर्धारण करने में सहयोगी साबित होगा।

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