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कभी बैंक में नौकरी करने वाले राजाराम त्रिपाठी आज 20 हजार से ज्यादा किसानों के लिए मददगार बन रहे हैं , औषधीय उत्पादों से कमा रहे है 60 करोड़ सालाना

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छत्तीसगढ़ की पहचान घने जंगलों से है, नक्सलवाद से यहां के सैकड़ों परिवार प्रभावित हैं, लेकिन यहीं के बस्तर जिले में कोड़ागाँव के डॉ. राजाराम त्रिपाठी औषधीय फसलों की खेती कर सैकड़ों आदिवासी परिवारों की जिंदगी बदल रहे हैं। बैंक अधिकारी की नौकरी छोड़ जड़ी-बूटी की खेती को अपनाने वाले किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी अपने 22000 हजारों किसानों की किस्मत बदल रहे हैं।

डॉ. त्रिपाठी छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके बस्तर में 1100 एकड़ में जड़ी-बूटी और मसालों की खेती करते हैं। उनकी खेती व तरीकों को देख कर लगता है कि खेती घाटे का सौदा नहीं है। डॉ. त्रिपाठी खेती की तस्वीर बदल देश में विदेशी पैसा भी ला रहे हैं।

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मूलरूप से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के रहने वाले डॉ. त्रिपाठी बस्तर संभाग के कोंडागांव में हर्बल खेती करते हैं:-
खेती के अलग-अलग तरीकों को जानने व कृषि आधारित सेमिनारों में भाग लेने के लिए डॉ. त्रिपाठी अब तक 22 देशों की यात्राएं कर चुके हैं।
पारंपरिक खेती में नुकसान उठाने के बाद त्रिपाठी ने जड़ी-बूटी की खेती शुरू की।शुरुआत में उनकी उपज को व्यापारी औने-पौने दामों में खरीदने की कोशिश करते थे। इससे निजात पाने के लिए डॉ. त्रिपाठी ने सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन की स्थापना की। आज इस फडरेशन से देशभर के 22 हजार किसान जुड़े हैं।फेडरेशन की वेबसाइट को एक साल में 11 लाख लोग देख चुके हैं, जिसमें 10 लाख विदेशी हैं।

1995 में हालैंड से गोभी के बीज लाकर खेती की शुरुआत :-
फसल भी अच्छी हुई। गोभी तैयार होने के बाद उसे बाजार में भेजा तो उनकी कीमत नहीं मिली। बाजार में गोभी डेढ़ रुपए किलो बिका।
उस दिन 600 किलो गोभी बेच सारा खर्च काट कर सिर्फ 25 रुपए कमाए। उसके बाद पारंपरिक खेती से तौबा कर जड़ी-बूटी की खेती करने की ठानी। लेकिन अब जडी-बूटी
से कमा रहे है 60 crore.

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रासायनिक खाद से रखते है दूरी :-
करीब 70 प्रकार की जड़ी-बूटियों की खेती करने वाली डॉ. त्रिपाठी अपनी खेती में रासायनिक खाद व कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करते। जैविक खेती में उनके योगदान को देखते हुए बैंक ऑफ स्कॉटलैंड ने 2012 में अर्थ हिरो के पुरस्कार से नवाजा था। जबकि सुगंधित खेती के लिए भारत सरकार ने उनको राष्ट्रीय कृषि रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया।डॉ. त्रिपाठी कहते हैं कि देश में किसान खुदकुशी रोकने के लिए जरूरी है कि उनकी आर्थिक हालत में सुधार हो। औषधि खेती से किसान आर्थिक रूप से समृद्धि हो सकते हैं।

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विश्व बजार में हमारी हिस्सेदारी:-
डॉ. त्रिपाठी बताते हैं कि बाटेनिकल फार्मा का विश्व बाजार 60 ट्रिलियन डॉलर का है।जबकि भारत में 4600 प्रजाति की ऐसी वनस्पतियां पाई जाती हैं, जिनका उपयोग औषधि बनाने में किया जा सकता है। विश्व बाजार में भारत 16000 डॉलर की जड़ी-बूटी निर्यात करता है।

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23 Comments

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