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उठों के लिए पहचाने जाने वाला राजस्थान अब ऊंटनी के बदौलत बनेगा समृद्ध, 300 रुपये लीटर है इसकी कीमत

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उठों के लिए पहचाने जाने वाला राजस्थान अब ऊंटनी के बदौलत बनेगा समृद्ध, 300 रुपये लीटर है इसकी कीमत

उठों के लिए पहचाने वाला राज्य राजस्थान में अब ऊंटनी का बोलबाला होगा क्यकि कई देश राजस्थान में उठानी के दूध पर रिसर्च कर चुके है और उन्होंने इसके दूध को अधिक फायदेमंद भी बताया है। रिसर्च के मुताबिक़ राजस्थान की उठनियों के दूध मे बाकी किसी भी उटनी से ज्यादा ताकत और पोषक होती है। बाकी दूधों से 10 गुना जयदा महंगा है उटनी का दूध।

कई देश लेकर जा चुके है सैंपल

पहले इजरायल की टीम भी सैंपल ले गई।जिनके अनुसार दिमागी रूप से कमजोर व 17 साल से कम उम्र के बच्चों का कद बढ़ाने में यह फायदेमंद साबित हो सकता है। पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डॉ. ताराचंद मेहरड़ा ने बताया कि जिले में पशुगणना के अनुसार ऊंट की संख्या 2166 है। जबकि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।

देवीलाल रायका , गोविंदसिंह रेबारी ने कहा कि ऊंट खरीदने, बेचने पर प्रतिबंध है। मादा के लिए तो प्रतिबंध ठीक है, लेकिन नर ऊंट पर प्रतिबंध हटना चाहिए। सब्सिडी भी कम है। जंगलों या चारागाह भूमि पर भी इसे चरने नहीं दिया जाता है।

ऊंटनी की संख्या कमी हो रही है।इस पर शोध हो चुका है। छह माह पूर्व इजरायल की टीम ने भी यहां ऊंटनी के दूध के लिए सैंपल लिए थे। जिले में भदेसर, बेगूं और गंगरार इलाके में ऊंठ पालन होता  है। – डॉ. सुमेरसिंह राठौड़, सहायक निदेशक, पशुपालन विभाग

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                                                           camel milk

ऊंटनी के दूध से फ़ायदा

राजस्थान में उठों के अधिक  वह के लोग अच्छे से उठा रहे है। अब राजस्थान में ऊंटनी के दूध को सिंगापुर निर्यात करने के बारे में सोचा जारा है। ऊंटनी के दूध में कई विशेषताएं होती हैं। बच्चों के शारीरिक विकास में भी यह उपयोगी

सिंगापुर इस दूध का अच्छा खासा पैसा देने को तैयार है। यह दोष भारत में 300 रुपए प्रति लीटर बिक रहा है। इसकी इक और खासियत है की यह दूध 2-2 महीनों तक ख़राब नहीं होता और ना हि फट ता है। राजस्थान के कुछ शहरों में लोगो ने ऊंटनी के दूध को निर्यात करना शरू भी कर दिया है।

राठौड़ ने बताया कि चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, सिरोही में 5-6 हजार लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहित हो सकता है। जिले में सावा की ढाणी की ऊंटनी का दूध  कमजोर बच्चों के साथ गंभीर बीमारियों के उपचार में काम आता है।ऊंटनी के दूध पर इजरायल के बाद अब जर्मनी में भी रिसर्च शुरू हो गया है। नतीजा और अच्छा रहा तो मेवाड़ी ऊंटों के दूध की डिमांड पूरी दुनिया में बढ़ जायेगी।

                                       benifits of camel milk

बिमारियों में बहुत कारगर है यह दूध

यह दूध बरसों से चाय, कॉफ़ी के साथ बीमारियां में भी काम लिया जा रहा है। शुगर, टीबी, दमा, सांस लेने में दिक्कत व हड्डियों को जोड़ने सहित टाइफाइड में भी फायदेमंद माना जाता है। रिसर्च कर्ताओं का मनना है कि अगर कोई वयक्ति लगातार इस दूध को पीता रहा तो उसके शरीर में खून की कमी नही होगी।और ना ही कोईं जल्दी किसी भी बिमारी का शिकार होगा।

27 साल से राजस्थान के ऊंटों पर रिसर्च कर रही जर्मनी की डॉ. इल्से कोल्हर रोलेप्शन ने सावा की ढाणी में इस दूध के सैंपल लेकर विदेश में भेजा। जर्मनी, सिंगापुर में शोध चल रहा है। इनके साथ-साथ कुछ और देशों में भी इसकी डिमांड है।

देश की पहली कैमल मिल्क डेयरी

23 साल पहले देश की पहली कैमल मिल्क डेयरी की शुरुआत हुई थी जो चित्तौड़गढ़/पाली (राजस्थान) जिले के सादड़ी में लोकहित पशुपालक संस्था व केमल करिश्मा सादड़ी ने किया था। इनके निर्देशक हनुवंत सिंह राठौड़ थे। राठौड़ ने बताया कि सादड़ी और सावा की ढाणी के ऊंटों के दूध पर लंबे समय से रिसर्च चल रहा है। खेजड़ी, बैर खाने से उनके शरीर में हाई प्रोटीन बनता है।

 

                                              camel milk factory

सरकार ने गलत जगह बनाया दूध का प्लांट

सरकार ने जयपुर में केमल दूध मिनी प्लांट लगाया है। जबकि चित्तौड़ जिले से एक हजार लीटर दूध हर दिन इक्कठा हो सकता है। प्लांट यहीं लगना चाहिए था। राज्य में सबसे ज्यादा ऊंटनी चित्तौडग़ढ़, भीलवाड़ा में हैं।

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