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यूपी के एक किसान ने खोजा पंजाब-हरियाणा में पराली की समस्या का आसान हल, लागत zero और उत्पादन में इज़ाफा

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साल में एक वक्त ऐसा आता है जब दिल्ली और आपसपास के इलाकों में आपको दिन में भी रात जैसा नजारा देखने को मिलता है और फिर न्यूज टीवी चैनल पर ख़बर आती है कि ये सब पंजाब-हरियाणा में पराली जला देने से हो रहा है। इसको लेकर राज्य सरकारों से लेकर भारत की सुप्रीम कोर्ट और अमेरिकी एजेंसी नासा तक चिंता जता चुका है क्योंकि यह इंसान के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।

लेकिन अब आपको परेशान होने की ज़रुरत नहीं है। दरअसल हर समस्या का एक समाधान होता है और इस समस्या का भी समाधान मिल चुका है। और श्रेय जाता है किसान जगरपाल सिंह।

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समाधान से पहले जाने कितनी बड़ी है ये समस्या

अकेले पंजाब में ही हर साल करीब 20 लाख टन पराली जलाई जाती है। पंजाब राज्य में करीब 28 लाख हेक्टेयर जमीन में धान और गेहूं की खेती होती है। एक अनुमान के अनुसार 95% पराली और 25% नाड़ को खेतों में जला दिया जाता है।

ऐसा तब हो रहा है जब पंजाब सरकार ने इसे जलाने पर पाबंदी लगाई हुई है। हालांकि अब तक पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की गई है। नतीजा, पराली के धुएं से दिल्ली और आसपास के इलाकों के लोगों को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और सांस के मरीजों का तो मानो सांस लेना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा प्रदूषण का स्तर जानलेवा हो जाता है।

पराली जलाने से खेतों को नुकसान क्या होता है

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक जल्दी बुवाई के लिए किसान पराली को जला देते हैजिससे खेतों में मौजूद भूमिगत कृषि मित्र कीट (वो कीट जो फसलों की बुवाई में मदद करते हैं।) और अन्य सूक्ष्म मित्र जीव मर जाते हैं। इससे शत्रु कीटों का प्रकोप बढ़ जाने के कारण फसलों को तरह-तरह की बीमारियां घेर लेती हैं।

नतीजा, फसल का उत्पादन काफी कम होता है और फिर किसान का मुनाफा घाटे में बदल जाता है।

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किसान जबरपाल सिंह ने क्या निकाला हल
जहां आमतौर पर दूसरे किसान धान, गेहूं और गन्ने की बुवाई के बाद दूसरी फ़सल की बुवाई के लिए पराली जला देते हैं। वहीं किसान जबरपाल सिंह ने एक ऐसा रास्ता अपनाया है, जिसमें पराली को बिना जलाए ही 15 से 20 दिनों के अंदर दूसरी फसल की बुवाई की जा सकती है।

उत्तर प्रदेश में बरेली से 45 किलोमीटर दूर करनपुर गाँव में रहने वाले किसान जबरपाल सिंह गन्ने की खेती करते हैं। जबरपाल के मुताबिक फसल की कटाई के बाद खेत में पहले हैरो (कृषि यंत्र) से जुताई करते हैं। फिर उसमें यूरिया और पानी का घोल मिलाकर खेत में डालते हैं। डंठलों को जलाने के लिए ऐजेक्टोवेंटर कल्चर और फास्टफीटा कल्चर को खेत में डालते हैं। 15-20 दिन के बाद खेत दूसरी बुवाई के लिए तैयार हो जाता है और पराली को जलाने की जरुरत नहीं पड़ती।

बरेली शहर के ही एक अन्य किसान अनस ख़ान ने भी जबरपाल सिंह के तरीके के मुताबिक ही गन्ने की फसल की क़टाई की। उनके मुताबिक इस तरीके को अपनाने से कोई खर्चां नहीं आता और खाद की लागत भी आधी हो जाती है। इस इलाके के कई किसान इस तरीके को अपना रहे हैं जिससे उन्हें काफ़ी आर्थिक फायदा मिल रहा है।

क्या होती है पराली

धान की फसल कटने के बाद बचे बाकी हिस्से को पराली कहते हैं। इसकी जड़ें ज़मीन में होती हैं। किसान फसल पकने के बाद तो उसका उपरी हिस्सा काट कर बाजार में बेच देते हैं लेकिन बाकी बचे बेकार के हिस्से को किसान जला देते हैं। क्योंकि किसानों को अगली फसल बोने के लिए खेत खाली करने होते हैं जिससे सूखी पराली को आग लगा दी जाती है। नतीजा, इसके जलने से धुआं इतना ज्यादा बनता है कि वातावरण प्रदूषित होने के साथ साथ इंसानों के लिए भी सांस लेना मुश्किल हो जाता है।

अगर आप जबरपाल सिंह जी से FB Live के जरीए बात करना चाहते हैं, तो हमारे फेसबुक पेज पर अपना नाम और नंबर पोस्ट कर दीजिए। जल्द ही हम आपकी उनसे LIVE बातचीत करवायेंगे।  यहां क्लिक करें

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3 Comments

  1. Like August 28, 2018

    Like!! Thank you for publishing this awesome article.

  2. It is in reality a great and useful piece of info. Thanks for sharing. 🙂

  3. ปั้มไลค์ October 5, 2018

    I believe you have mentioned some very interesting points, regards for the post. 🙂