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मोदी-योगी युग में बढ़ गई गायों की जनसंख्या, जानिए क्या हैं वो 5 फायदें जो मिलेंगे हर नागरिक को

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2014 लोकसभा चुनाव ( Loksabha election ) में जीतकर बीजेपी सत्ता में क्या आई, गाय पूरे देश में चर्चा के केंद्र में आ गई। आए दिन गाय को मारने और बचाने को लेकर अलग अलग समुदायों में लड़ाई झगड़े की ख़बरे आती ही रहती हैं लेकिन इस बीच एक बहुत अच्छा काम हुआ है।

अच्छा काम ये कि गायों की तेजी से घटती जनसंख्या पर ना केवल रोक लगी बल्कि इनकी जनसंख्या भी बढ़ी है। जिसका हर तरह से सीधा फायदा देश के हर नागरिक को ही मिलना है।

गोवंश में बढ़ोत्तरी

गोवंश यानी गाय-बैल की जनसंख्या में इजाफा हुआ है। देश में समय समय पर नागरिकों की जनगणना के साथ साथ गाय-बैलों की भी जनगणना होती है। 2007 की जनगणना के मुताबिक पहले यह संख्या सिर्फ 1 करोड़ 91 लाख थी जो अब बढ़कर 1 करोड़ 95 लाख 57 हजार हो गई है।

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देश के हर नागिरक को इसके फायदे क्या है 

शहर के लोगों को शायद गाय-बैलों की जनसंख्या बढ़ने की अहमियत आसानी से समझ ना आए, लेकिन रूरल इंडिया यानी ग्रामीण भारत के लोगों को यह बात बहुत अच्छे से समझ आ जाएगी।

देखिए कि इसके क्या क्या फायदे शहर-गांव-देहात हर जगह के नागरिक को मिलेंगे

  1. खाद की कमी समस्या दूर होने की संभावना बढ़ेगी क्योंकि गाय-बैल के गोबर से खाद बनती है
  2. गायों की संख्या बढ़ने से दूध का उत्पादन बढ़ेगा, जिससे दूध के दाम में कमी आने की संभावना बढ़ जाती है। यानी लोगों को दूध के लिए ज्यादा दाम नहीं देने होंगे
  3. खाने का ओरगैनिक सामान खरीदने वाले लोगों को भी ऐसे प्रॉडक्ट के लिए थोड़ा कम दाम देना होगा।
  4. इससे खेती की लागत कम होगी तो किसानों को फायदा ज्यादा होगा
  5. गायों की संख्या जब ज्यादा होगी तो बाजार में उनकी कीमत भी कम होगी, जिससे डेरी फॉर्म चलाने वालों को लागत कम आएगी।

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रासायनिक खाद्यों के इस्तेमाल से ज़मीन को हो रहा नुकसान

उत्पादों को बढ़ाने व बेहतर उत्पादन के लिए किसान देसी खाद को छोड़कर रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे ज़मीन की उर्वरा शक्ति खत्म होती जा रही है। उर्वरा शक्ति यानी उत्पादन क्षमता।

साल 2015-16 में यूरिया का 40 लाख टन अतिरिक्त उत्पादन किया गया था, जिससे देश में यूरिया की कमी नहीं हुई। खेती के लिए स्वस्थ मिट्टी में एनपीके (नाइट्रोजनपोटाशफॉस्फोरस) का अनुपात 4-2-1 का होता हैलेकिन एक सरकारी शोध में पाया गया कि यूरिया के अत्यधिक प्रयोग से देश में यह अनुपात लगभग 8-3-1 हो चुका है।

2013 तक तो उर्वरकों पर सरकारों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी 76,000 करोड़ का आंकड़ा पार कर गई।

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रासायनिक खाद्यों की खपत करने वाला भारत दूसरा सबसे बड़ा देश 

भारत इस समय रासायनिक खादों की खपत करने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। देश में 34 फीसदी नाइट्रोजन और 82 फीसदी फास्फेट के अलावा अन्य सौ फीसदी रासायनिक खाद दूसरे देशों से निर्यात किये जाते हैं। इसके अलावा अनाज उत्पादन की बढ़ती जरूरत को देखते हुए रासायनिक खाद के आयात का प्रतिशत भी बढ़ता जा रहा है।

रासायनिक खाद्यों के क़ीमत में आए दिन हो रही बढ़ोत्तरी

किसान एक एकड़ खेत में लगभग दो क्विंटल रासायनिक खाद का इस्तेमाल करता है। इन रासायनिक खादों की कीमत लगभग 18 रुपए से लेकर 36 रुपए तक होती है। लेकिन बढ़ते वक्त किसानों की बढ़ती मांग और इनसे होने वाले अधिक उत्पादन के कारण इन रासायनिक खादों की कीमतों में आए दिन बढ़ोतरी होती जा रही है। 250 रुपए में बिकने वाली यूरिया डाई पोटाश की कीमत अब बढ़कर 700 रुपए क्विंटल हो गई है। लगभग एक एकड़ के लिए किसानों को लगभग हजार से ज्यादा तक की खाद लग जाती है।

 

 

Tag  Modi-Yogi ki sarkar m cow ki jansankhya, chemical khad, cow se hone wale fayde, gau rakshak abhiyan, gau raksha, beef

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