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गुजरात में खोजी गई इस अनोखी घास ने उत्तर प्रदेश में भी जमाए पैर, पशुओँ का दूध बढ़ा देने वाली इस घास को 1 बार लगाने पर 5 साल तक मिलता है चारा

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सभी को पता है कि दूध देने वाले पशुओँ के लिए चारा कितना ज्यादा जरूरी है। आमतौर पर गाय-भैंस-बकरी पालने वाले लोग अपने पशुओँ को खाने में आम घास ही देते हैं। लेकिन अब जिज्वा नाम से घास भी इजाद हो चुकी है, जिसमें न सिर्फ आम घास के मुकाबले दोगुना प्रोटीन होता है, बल्कि पशु भी इस घास को बहुत चाव से खाते हैं। ज्यादा प्रोटीन भरी होने से आप एक समय चारे के स्थान पर पशुओं को यह घास खिला सकते हैं। ये बात तो आप मानते ही हैं कि अगर पशु को उसकी पसंद का चारा खाने को मिल जाए और साथ में ज्यादा प्रोटीन वाला, तो दूध वो ज्यादा देने लगते हैं।



1 बार लगाओ और 5 साल तक 1 बार की ही लागत में चारा पाओ
जिज्वा नाम की यह घास उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के अखा गाँव में 32 साल के पशुपालक देवेश सिंह ने लगाकर देखी तो उन्हें इसके ढेरों फायदे नजर आए। उनका कहना है कि इस घास के सहारे पशुपालक न सिर्फ पैसों की बचत कर सकते हैं बल्कि पशुओं को भी अधिक स्वस्थ बना सकते हैं। सबसे अच्छी बात ये हैं कि किसान इस घास को एक बार उगाकर पांच साल तक काटते रह सकते हैं।
देवेश सिंह पिछले कुछ महीनों से इस घास को अपने खेतों में उगा रहे हैं। उन्होंने अपने आधा बीघा खेत में जिज्वा घास को उगा रखा है। इस घास में इतना पोषण होता है कि वे अपने चार पशुओं को एक समय के दाने की जगह ये घास ही खिलाते हैं। यह घास उन्हें एक पशुचिकित्सा के वैज्ञानिक ने दी है।




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कहां से आई उत्तर प्रदेश में जिज्वा घास

भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई IVRI), बरेली के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ रनवीर सिंह इस घास को गुजरात के राजकोट से कर लाए थे।

डॉ. सिंह ने बताया कि मैं, अध्ययन के लिए राजकोट गया था, वहां एक प्रसिद्ध गोशाला है, जहां दाने के बदले ये घास गायों को खिलाई जाती है। इसके कुछ पौधों को जब मैंने संस्थान में लाकर परीक्षण किया तो पाया कि इसमें सामान्य घास के मुकाबले ज्यादा प्रोटीन है। उन्होंने बताया कि सामान्य घास में 8 से 9 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है वहीं जिज्वा में 15 से 18 फीसदी प्रोटीन है।
उत्तर भारत की जलवायु को देखते हुए जिज्वा घास को बहुत ही आसानी से यहां उगाया जा सकता है।
जिजवा घास
जिजवा घास

कैसे हुई इसकी खोज

दरअसल, गुजरात के अहमदाबाद शहर में मशहूर गौशाला है बंशी गौशाला। इसके संचालक हैं गोपाल भाई सुतालिया। सुतालिया ने 1 साल तक जिज्वा घास पर परीक्षण किया। उन्होंने 10-10 बीघा खेत में जिज्वा घास के साथ साथ बाकी करीब आधा दर्जन घासें भी उगाई। इसके बाद उन्होंने खेत में दूध देने वाले पशुओं को इन्हें खाने के लिए खेत में खुला छोड़ दिया।

वो ये देखकर हैरत में पड़ गए कि पशुओं ने सभी घासों को चखा लेकिन उनको सबसे ज्यादा पसंद तो जिज्वा घास ही है और वो इसको ही खाते रहे।

जिज्वा घास मीठी होने की वजह से पशुओं को ज्यादा पसंद आती है। नतीजतन उनका दूध उत्पादन बढ़ जाता है।

लगात में कमी जबरदस्त कमी

आमतौर पर किसानों को गाय-भैंस के लिए हरा चारा बार बार उगाना पड़ता है जबकि जिज्वा घास को सिर्फ 1 बार लगा दो तो वो 5 तक उत्पादन देती ही रहती है।



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