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दुनियाभर में मशहूर पंजाब और यूपी के आलू का छक्के छूडा रहा है गुजरात का आलू, कम शूगर और उन्नत किस्म की कायल है मल्टीनेशनल कंपनियां : किसानों की बल्ले बल्ले

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गुजरात के बनासकांठा के किसान आलू की खेती से करोडपति बन गए है। जी, हां पार्थी चौधरी नाम के मेहसाणा के किसान ने तो रिकोर्ड तोड आलू की पैदावार की है। पार्थी चौधरी ने तीन साल पहले प्रति एकड़ 87 टन आलू पैदा कर गुजरात में सबसे ज्यादा आलू पैदा करने का रिकोर्ड अपने नाम कर लिया है। इस साल भी उनके यहां आलू की बंपर पैदावार हुई है। दरसल चौधरी के पास पालनपुर में 90 एकड़ में फैला फार्म हाउस है। उन्होंने राजकोट के बालाजी वेफर्स के लिए अपने आलू उपजाएं है। पेप्सी बनाने वाली पेप्सिको कंपनी भी इनसे आलू खरिदती है। चौधरी को प्रति एकड इस साल 67 टन का उत्पादन हुआ है। चौधरी के मुताबिक उनके पास 1400 टन माल कोल्ड स्टोरेज में रखा है। आज की तारिख में इस माल की किमत करीब 2 करोड रुपये है। उनके मुताबिक 120 दिन में 52 लाख रुपये की लागत से उन्हे तकरीबन 300 गुना मुनाफा हुआ है।

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क्यों गुजराती आलू है सबका पसंदीदा

दरसल गुजरात के आलू पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के आलू से बेहतर है। मैक्केन, मैक्डॉनाल्डस जैसी मल्टिनेशनल कंपनिया गुजरात के आलू की दिवानी है। क्योंकि गुजरात की आबोहवा आलू की पैदावार के लिए सबसे बेहतर है। यहां के किसान लेडी रोसैट्टा नाम  की किस्म उगाते है। लेडी रोसैट्टा आलू की उन्नत किस्म है जिसमें शूगर की मात्रा कम होती है और गुदा ज्यादा। अपने चमकदार चेहरे की वजह से इसे लेडी रोसैट्टा कहते हैं।

पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से भी इन कंपनियों ने आलू खरिदें लेकिन कड़ी ठंड की वजह से यहां का आलू भारी होता था और शूगर की मात्रा ज्यादा जिससे की इन कंपनीयों की प्रोक्ट्स आलू फ्राइस और चिप्स का रंग बदल जाता था। वहीं गुजरात की तरह ही पश्चिम बंगाल का मौसम भी आलू के लिए अच्छा है लेकिन कांट्रेक्ट फार्मिंग के लिए वहां जोत का आकार बहुत ही छोटा था। लिहाजा गुजरात का आलू बन गया इन कंपनियों का फेवरिट।

कैसे करते है बनासकांठा के किसान आलू की खेती

आलू को उतना ही पानी चाहिए जितना कि मिट्टी और पत्तीयों से भाप बनकर उड़ जाए। मैक्केन कंपनी ने यहां कि किसानों को अपने तरिके से खेती करने की तालिम दी है। यहां फव्वारे से सिंचाई करके और पानी – नाइट्रोजन का उपयोग एक तिहाई कम करके आलू की पैदावार की जाती है। राज्य सरकार की तरफ से सब्सिडी और आठ घंटे की बिजली किसानों को उपलब्ध कराई जाती है। सिंचाई के लिए फव्वारे कितनी देर तक चलेंगे ये कंपनी के मौसम स्टेशन तय करते है। ये स्टेशन राजस्थान के माउंट आबू में और साबरकांठा के हिम्मतनगर में बने है। फोन और मोबाइल मैसेज के जरिए फिल्ड का स्टाफ किसानों तक सूचनाएं पहुंचाता है।

कैसे हुई शुरुआत

कांट्रेक्ट फार्मिग की शुरुआत यहां साल 2006 में मैक्केन कंपनी ने की थी। शुरुआत चार किसानों की सोलह एकड़ जमीन से हुई थी। जो आज बढ़कर 4500 एकड़ हो गई है और करीब 900 किसान इसका हिस्सा है। कंपनी ने मेहसाणा में ही अपना एक प्लान्ट खोल रखा है जो यहां के ज्यादा से ज्यादा किसानों को खुद से जुड़ने के लिए आमंत्रित करते है।

कैसे करते है कांट्रेक्ट खेती

नवंबर महिने में जब आलू के सीजन की शुरुआत होती है तब किसान और कंपनी के बीच कांट्रेक्ट होता है। किसान कंपनी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करता है कि मार्च के तीसरे महिने तक कंपनी को बीज की मात्रा से दस गुने फसल की आपूर्ति कर दी जाएगी। फसल की गुणवत्ता का पैमाना पहले से स्पष्ट कर दिया जाता है। आलू की सभी किस्मों की गुजराती भाषा में ही जानकारी दी जाती है। खेती से जुड़ी अन्य सलाह फोन पर उपलब्ध कराई जाती है। किसानों को बीज आधी कीमत पर दी जाती है। बाकि आधा फसल की बिक्री के वक्त काट लिया जाता है।

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