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नजल्लानी किस्म की इलायची बना चुकी है केरल और कर्नाटक के किसानों को करोड़पति, नजल्लानी इलायची की बाजार में हमेशा रहती है जबरदस्त मांग, 30 प्रतिशत बाजार पर है इसका कब्जा

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दुनिया के बाजार में भारतीय मसालों की क्या ताकत है ये बताने की जरूरत नहीं लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन मसालों को पिछले 25 साल में किसने सबसे बड़ी पहचान दिलाई है? किस तरह इलायचकी की एक खास किस्म ने किसानों को करोड़पति बना दिया है।

जिस तरह सब्जी में आलू और फलों का राजा आम माना जाता है उसी तरह दक्षिण भारत में जबरदस्त ढंग से उत्पादन करने वाली नजल्लानी (Njallani) किस्म की इलायची को मसालों का राजा बोला जाए तो शायद गलत नहीं होगा।

ये वो किस्म है जिसकी खोज करने वाले किसान जोसेफ खुद तो गरीब ही रह गए लेकिन उनकी खोज ने केरल और कर्नाटक के किसानों को करोड़पति बना दिया।




क्या है नजल्लानी (Njallani) किस्म की इलायची की खासियत

केरल में इडुक्की नाम का एक जिला है। इस जिले की पहचान नजल्लानी किस्म की इलायची के सबसे बड़े उत्पादक के रूप बन गई है। इस वजह से दुनिया में ग्वाटेमाला के बाद भारत की इलायची का ही डंका बजता है।

नजल्लानी किस्म की इलायची प्रति हेक्टेयर उत्पादन 1500 किलो देती है जबकि बाकी दूसरी किस्म की इलायची का उत्पादन प्रति हेक्टेयर सिर्फ 200 से 250 किलो के बीच ही रहता है। यानी अगर किसान नजल्लानी किस्म की इलायची लगाता है तो उसे 6 से 7.5 गुना तक ज्यादा उत्पादन मिलता है।

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कीमत कितनी है बाजार में

इलायची को महंगा मसाला माना जाता है। मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत 280 से लेकर 330 रूपए प्रति किलोग्राम है। जबकि घरेलू बाजार में इसकी कीमत करीब 350 रूपए प्रति किलो है।

पिछले साल केरल में किसानों ने 1500 किलो नजल्लानी इलायची को बाजार में करीब 5 लाख 25 हजार रूपए में बेचा था। जबकि 200 से 250 किलो उत्पादन वाली इलायची 87500 में बिकी।

2001 में तो एक किसान ने तो एक हेक्टेयर खेत से नजल्लानी किस्म की इलायची से 2750 किलो उत्पादन हासिल किया, जिसके स्पाइस बोर्ड ने उस किसान को अवॉर्ड देकर सम्मानित भी किया।

आज के दौर में भारत में जितना भी मसाले का कुल उत्पादन होता है उसमें 70 प्रतिशत हिस्सेदारी नजल्लानी इलायची की है।

 

कैसे हुई इसकी खोज

90 के दशक में इसकी खोज चौथी क्लास तक पढ़े किसान जोसेफ ने गलती से कर डाली। लेकिन उस गलती का फायदा 2 दशक बाद दक्षिण भारत के हजारों किसानों को जबरदस्त ढंग से हो रहा है।

दरअसल, जोसेफ ने सोचा कि क्यों ना खेती के साथ साथ मधुमक्खी पालन से कुछ अतिरिक्त कमाई की जाए। इस विचार के साथ जोसेफ ने इलायची के खेत पर मधुमक्खियों के पालन का काम शुरु कर दिया। लेकिन मधुमक्खियों ने तो इलायची की प्रजातियों को परागण करने का काम शुरु कर दिया।




ये भी पढ़ें – देश में खेती में और कौन कौन सी नई खोजें हुई हैं जो किसानों को दे रही है जबरदस्त कमाई का मौका

ये देखकर जोसेफ के दिमाग में एक नया आइडिया आया। उन्होंने सबसे पहले तो परागण से तैयार हुई इलायची की प्रजातियों को बाकी सामान्य प्रजातियों से अलग करने के लिए जाल डाल दिया। ताकि मधुमक्खियां उनका रस ना चूस लें। साथ ही उनको जोसेफ ने निशान लगाकर चिन्हित भी कर दिया।

इन पौधों को गिनने के बाद इनमें से ज्यादा उत्पादन देने वाले पौधों को अलग करके परागण कराया। ये सब करने में उनको करीब 1 दशक यानी 10 साल लग गए। लेकिन 10 साल बाद उन्होंने जबरदस्त खोज की और एक नई किस्म को तैयार कर दुनिया को दे दी।

उनकी इस अनोखी रिसर्च में पता चला कि पहले तो इलायची के पौधे 30 से 40 के बीच इलायची देते थे, लेकिन जोसेफ के तरीके से तैयार की गई नई किस्म के पौधे से 120 से 150 के बीच इलायची मिलने लगी।

इस खोज के बाद जोसेफ ने इलायची की नई किस्म का नाम अपने परिवार के नाम पर रखा यानी नजल्लानी।

राष्ट्रीय इलायची अनुसंधान संस्थान ने भी इस बात को सही पाया कि जोसेफ की खोज नजल्लानी इलायची बाकी सभी किस्म से बहुत ज्यादा उत्पादन देती है।

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सवाल ये कि न्यूजपेपर, रेडियो, टीवी के बाद मीडिया को ऑनलाइन मीडिया का जो नया रूप मिला है उसके बाद अब क्या होगा? सवाल ये भी क्या जो मीडिया हाउसिस ने 200-300 पत्रकारों की टीम बैठाकर पोर्टल चला रहे हैं वो आने वाले समय में बड़ी टीम के बोझ को झेल पायेंगे? क्या आने वाले 5 से 8 साल में इनमें भी टीवी न्यूज़ की तरह ही छटनी होगी? सवाल ये भी क्या वाकई में 5 साल बाद ये पोर्टल अपने कर्मचारियों की सैलरी की जिम्मेदारियों के अलावा तकनीकी और प्रमोशन के स्तर पर बढ़ने वाले खर्चे को झेल पायेंगे? क्या वाकई में टीवी की रेटिंग फाइट की तरह ऑनलाइन मीडिया ट्रैफिक की लड़ाई में जिंदा रह पाएगा। कुल मिलाकर एक ही सवाल कि मीडिया के नए रूप ऑनलाइन मीडिया का अगला रूप क्या देखने को मिलेगा। शायद ये सवाल समय से काफी पहले पूछा गया लगे लेकिन सच्चाई ये है कि ऑनलाइन मीडिया के मामले में भारत बहुत देरी से एंटर हुआ है। इसलिए अतंर्राष्ट्रीय पर इस सवाल के जवाब की खोज भी शुरु हो चुकी है और कुछ हद तक जवाब भी मिल चुका है। जवाब मिला है UGC और PGC कॉन्टेंट मार्केट के रूप में।

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2 Comments

  1. Like!! Great article post.Really thank you! Really Cool.

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