घर पर ही तैयार करें 50 पैसे प्रति किलो वाली खाद, अजोला के पौधे से बनता है जैविक खाद, यूरिया का सबसे अच्छा विकल्प है अजोला, इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं।

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खेत, खाद और यूरिया – ये तीन ऐसे शब्द हैं जिन्हें खेती के बारे में ना जानने वाले भी अच्छे से पहचानते हैं। लेकिन किसान ये बात अच्छे से जानता है कि यूरिया के इस्तेमाल से जितना फायदा होता है उससे कहीं ज्यादा नुकसान उसके खेत की उपजाऊ क्षमता को होता है। ऐसे में किसान क्या करे। उसको यूरिया का बेहतरीन विकल्प या तो आसानी से मिलता नहीं है या फिर इस बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है।

इस बार हम लेकर आएं है आपकी इसी समस्या का बहुत ही अच्छा समाधान।




अजोला (Azolla) ये एक ऐसा पौधा है जो वैज्ञानिकों के मुताबिक 39 लाख साल से धरती पर मौजूद है। इसे मॉस्किटो फर्न भी कहा जाता है क्योंकि यह फर्न प्रजाति का पौधा है। अजोला पानी पर तैरने वाला पौधा है।

अगर अजोला के पौधे को पानी की किसी टंकी या हौदी में डाल दिया जाए तो यह इतनी तेजी से बढ़ता है कि पूरी हौदी में कुछ ही दिनों में फैल जाता है।

पानी में अजोला, हरे और नीले रंग की परत बना देता है। अगर इसे रूके हुए पानी में डाल दिया जाए, तो अजोला की वजह से मच्छरों के लार्वा और प्यूपा को ऑक्सीजन को नहीं मिलता। इस वजह से वो जल्द ही खत्म हो जाते हैं।




azolla-kaya-hai-aur-iske-faayde-kaya-hainअजोला के और भी फायदें

  1. खेतो में अगर किसान यूरिया और बाकी खाद की जगह अजोला से बनी खाद डालें, तो खेत की मिट्टी की उर्वरा शक्ति तो बढ़ती ही है साथ ही उत्पादन भी अच्छा हो जाता है। 1 हेक्येटर (करीब 2.5 एकड़) खेत में 10 टन अजोला से बनी खाद डालने की जरूरत होती है।
  2. अजोला नाम का यह पौधा, खाद के रूप में बेहतरीन विकल्प है।
  3. गाय-भैंस के चारे के लिए ये बहुत अच्छा है। सस्ता भी है और पोष्टिक भी है।
  4. इससे मच्छर पैदा नहीं होते और जहां इस रखा जाता है, वहां मच्छरों बिल्कुल नहीं आते।
  5. इसमें 25 प्रतिशत प्रोटीन होता है, जो कि बहुत अधिक और अच्छा है। विटामिन-ए, विटामिन-बी-12, बीटा कैरोटीन और अमीनो एसिड भी है। इसके अलावा इसमें पोटेशियम, फास्फोरस, कैल्शियम, कॉपर और मैगनीशियम भी होता है।
  6. अगर इसे गाय-भैंस, भेड़-बगरियों को खिलाया जाता है तो इससे इनका उत्पादन और प्रजनन शक्ति की क्षमता काफी बढ़ जाती है। इसका इस्तेमाल अगर मुर्गीपालन और पशुपालन करने वाले लोग करें, तो इसके फायदा ही मिलेगा।
  7. इसे होटलों में सजावट के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाने लगा है।

धान के खेतों में या फिर उथले पानी वाले जगह पर इसका उत्पादन किया जा सकता है। इसकी उत्पादन लागत सिर्फ 50 पैसे प्रति किलो आती है।

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