पूर्वोतर राज्यों में भी चली खेती की बयार, पहाड़ों पर खेती करने वाले भी कर रहे हैं अच्छी कमाई

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सिक्किम के लेपचा ने लिखी सफलता की नई कहानी

खेती में सफलता की कहानियां सिर्फ मैदानी इलाकों यानी यूपी, एमपी,बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात जैसे राज्यों के युवा किसान ही नहीं लिख रहे बल्कि पहाड़ी इलाकों वाले राज्य सिक्किम, असम भी इस दौड़ में शामिल हैं

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दिल्ली के मुर्निका इलाके में अगर आप चले जाएं, तो आपको ऐसा लगेगा कि मानो नॉर्थ ईस्ट भारत के किसी राज्य में आ गए है। यहां आपको लगभग 90 प्रतिशत लोग नॉर्थ ईस्ट राज्यों के ही मिलेंगे जो ट्रेन में करीब 2 से ढाई दिन का सफर कर नौकरी की तलाश में दिल्ली आते हैं।

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Lepcha from Sikkim - Succesful Farmer1
Lepcha from Sikkim – Succesful Farmer

लेकिन सिक्किम के 26 साल के युवा किसान नीम तशेरिंग लेपचा इस भीड़ से बिल्कुल अलग हैं। लेपचा ने ये साबित कर दिया कि पहाड़ों में भी खेती से अच्छी कमाई की जा सकती है।

लेपचा आजीविका के लिए अपने दो हैक्टर खेत में पारंपरिक खेती करते थे। बहुत मेहनत के बाद भी कम उत्पादन की वजह से आय कुछ खास नहीं थी। लेकिन लेपचा ने ICAR के सिक्किम स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र जाकर नए जमाने की खेती की जानकारी लेने का फैसला लिया और अब उस फैसल की वजह से उनको अपने बाकी साथियों की तरह पैसे कमाने के लिए अपना राज्य छोड़कर दिल्ली आने की जरूरत नहीं है।




ICAR से मिली तकनीकी मदद ने बदली किस्मत

लेपचा का खेती के जरिए अपनी जिंदगी बेहतर करने के ICAR और राष्ट्रीय जलवायु समुत्थानशील कृषि नवाचार (एनआईसीआरए NICRA) से काफी अच्छी मदद मिली।

Lepcha from Sikkim - Succesful Farmer2
Lepcha from Sikkim – Succesful Farmer

केवीके द्वारा दिये गए सहयोगों में प्रमुख रूप से जलकुंड बनाने के लिए एग्री-पॉलीथीन शीट (250 जीएसएम), सूक्ष्म वर्षाजल एकत्रण संरचना, सब्जी की क्रमबद्ध खेती के लिए कम लागत वाली प्लास्टिक की पाईप (पारदर्शक 45 जीएसएम यूवी स्थिर शीट), चावल की फसल के पश्चात बिना जुताई के खेती के लिए मटर (टीएसएक्स-10) की बीज, उन्नत मक्का किस्म आरसीएम 1-1 और उन्नत चावल किस्म आरसीएम 10, आंगन में मुर्गी पालन के लिए ‘वनराजा’ किस्म तथा चारा उत्पादन के लिए नेपियर संकर इत्यादि शामिल हैं।

इसके साथ ही वैज्ञानिक प्रबंधन विधियों के तहत ग्रास कार्प और कॉमन कार्प, दूधारू गाय में संकर जर्सी और बड़ी इलायची की सावनी और वारंलांगी किस्मों की खेती की ट्रेनिंग मिली।

सब्जियों में बंदगोभी, फूलगोभी किस्म सुहासिनी, ब्रोकोली किस्म एवरेस्ट, टमाटर किस्म अर्का सम्राट, धनिया की किस्म सुपर मिडोरी की भी ट्रेनिंग दी गई।

ये सभी सुविधाएं और ट्रेनिंग मिलने के बाद लेपचा ने सुपर मिदोरी, पालक, चायनीज सफेद मूली की खेती क्रमबद्ध तरीके से कम लागत वाले प्लास्टिक टनल में खेती की। 5 मी x 4 मी. x 1.5 मी. (क्षमता 30,000 ली.) आकार के जीवन रक्षक जलकुंड का भी निर्माण किया गया।

कमाई पहले कितनी थी और अब कितनी हो गई

Whatsapp Farmers NetworkICAR, NICAR की मदद और लेपचा की मेहनत की नतीजा ये रहा कि लेपचा की कमाई अब पहले के मुकाबले कई गुना हो गई। अब लेपचा का प्रॉफिट 4,15,050/रु. है। किससे कितनी कमाई हुई ये जानकारी नीचे दी गई है।

  1. [(चावल की खेती (25 हैक्टर) = 8000 रु.
  2. मक्का उत्पादन से (25 हैक्टर) = रु. 9,500
  3. क्रमबद्ध सब्जी उत्पादन (सत्र/वर्ष) प्लास्टिक टनल (05 हैक्टर) के तहत = 1,50,000 रु.
  4. रबी की सब्जियों (शून्य जुताई विधि से मटर और अन्य फसल 15 हैक्टर की खेती में) = 12,500 रु.
  5. बड़ी इलायची उत्पादन (25 हैक्टर) = 45,000 रु.
  6. दूध उत्पादन (2,880 लीटर/वर्ष) = 75,800रु.
  7. आंगन में मुर्गीपालन (वजराजा, संख्या-100) = 63,750 रु.
  8. मात्स्यिकी (संख्या-500, ग्रास कार्प और कॉमन कार्प) = 50,500 रु.
  9. पारंपरिक खेती प्रणाली द्वारा से कमाई 1,65,000 रु.

इस सफलता के बाद लेपचा न केवल अपने गांव के किसानों बल्कि पूर्वी सिक्किम के किसान समुदाय के लिए एक आदर्श हैं। नजदीक के गांवों के प्रधान इस उदाहरण से प्रेरित होकर किसानों को जैविक खेती प्रणाली अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं।

इस लेख के बारे में आपके जो भी विचार है वो आप नीचे कॉमेंट बॉक्स में लिखने सकते हैं।

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27 thoughts on “पूर्वोतर राज्यों में भी चली खेती की बयार, पहाड़ों पर खेती करने वाले भी कर रहे हैं अच्छी कमाई

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