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किसानों के काम आ सकता है 3 साल बाद दुनिया में आने वाला है तेल का महासंकट, क्या बायोडीजल बनेगा संकट मोचक? बायोडीजल का अभी कैसे हो रहा है कारोबार, पढ़िए पूरी रिपोर्ट

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संकट क्या है?

जिस तरह इंसान के जिंदा रहने के लिए खाना, खाना जितना जरूरी है उसी तरह गाड़ियों के लिए तेल यानी पेट्रोल डीजल जरूरी है। तेल नहीं तो 10 करोड़ की कार का भाव 1 रूपया भी नहीं।

कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2020 के बाद पूरी दुनिया को तेल की भारी कमी के महासंकट का सामना करना पड़ सकता है। यानी तेल की कमी हो जाएगी और दाम आसमान छूने लगेंगे।

2011 की रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में करीब 60 करोड़ कारें सड़कों पर रोजाना दौड़ रही हैं। ट्रकों, मोटरसाइकिल, स्कूटर, बस, टेम्पो, ट्रेन इत्यादि मिलाकर ये संख्या लगभग दोगुनी हो जाती है।




एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले 20 से 30 सालों में पेट्रोल-डीजल खत्म हो जाएगा।

शायद यही कारण है कि देश में मोदी सरकार ने इसी महीने 10 अगस्त को जैविक ईंधन से जुड़े कार्यक्रम की शुरूआत कर दी।

कई देश इस तरह की पहल काफी साल पहले ही कर चुके हैं। यूरोप संघ के जर्मनी और ऑस्ट्रिया जैसे सदस्य देशों ने तो इसकी 21वीं सदी की शुरुआत में यानी पिछले दशक में ही शुरुआत कर दी थी।

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क्या है बायोडीजल?

बायोडीज़ल को दुनिया डीजल के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करती है। इसे वनस्पति तेलों और एल्कोहल की मदद से बनाया जाता है। खाद्य तेलों जैसे पाम ऑयल, सोयाबीन और रेपसीड से बनाया जाता है, लेकिन भारत में करंजिया और जटरोफा के तेल का इस्तेमाल ज्यादा किया जा रहा है।

जटरोफा एक पौधा होता है, जिसके पौधों से तेल निकाला जाता है और फिर इसे मशीनों की मदद से डीजल की तरह तैयार कर गाड़ियों के इस्तेमाल के लायक बनाया जाता है। ये डीजल के मुकाबले ना केवल सस्ता होता है बल्कि इससे प्रदूषण भी नहीं होता।

जटरोफा, एक जंगली पौधा है, जो कि जंगलों में पाया जाता है। लेकिन अब सरकारें इसकी कॉन्ट्रेक्ट खेती पर जोर दे रही हैं। इंडोनेशिया और ब्राजील में ये सालों से हो रहा है।

भारत में मौजूदा स्थिति क्या है

भारत में इसका इस्तेमाल अभी हाल ही में शुरु हुआ है। Indian Oil Corporation यानी IOC ने CREDA के साथ मिलकर एक ज्वाइंट वेंचर कुछ साल पहले लांच किया था। जो बायोडीजल तैयार कर रेलवे, हरियाणा रोडवेज और टाटा कंपनी को देता है।

इसी महीने यानी 10 अगस्त 2016 को भारत सरकार ने भी एक कार्यक्रम कर इसे लांच कर दिया। कुछ प्राइवेट कंपनियां भी इस दिशा में देश में काम कर रही हैं।




विदेशों में क्या स्थिति है।

जटरोफा पौधे से बायोईंधन बनाने के लालच में इंडोनेशिया और ब्राजील के जंगलों को खत्म किया जा रहा है। ऐसे में जंगलों को बचाने के लिए यूरोपीय संघ ने 2011 में सर्टिफिकेट सिस्टम लागू कर दिया।

यानी बायोईंधन का व्यापार करने वाली कंपनी, कॉन्ट्रेक्टर और किसान के पास इसका विशेष सर्टिफिकेट होना सबसे ज्यादा जरूरी है। इसके बिना अगर कोई भी कंपनी, कॉन्ट्रेक्टर और किसान इसकी खेती या व्यापार करते हैं तो इसे गैरकानूनी माना जाता है।

यह सर्टिफिकेट इस बात का सबूत होता है कि बायोईंधन बनाने के लिए उत्पादकों ने किसी भी तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाया है।

यानी उत्पादकों को यहां तक बताना होगा कि वो 1 हेक्टेयर खेत में कितनी खाद डालेंगे, मजदूरों से कितने घंटे काम लेंगे, कितना तेल वो पैदा कर सकते हैं और कितना वो बेचते हैं।

कंपनी के साइज के हिसाब से सर्टिफिकेट की कीमत तय होती है, जो कि 80 हजार रूपए से लेकर 6 लाख रूपए तक हो सकती है। मौजूदा स्थिति में ऑस्ट्रिया और जर्मनी में ही यह नया कानून लागू हुआ है।

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