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भारतीय पालेकर के शून्य लागत वाले खेती के फॉर्मूले से आई विदेशों में क्रांति, 40 लाख किसानों का उत्पादन दोगुना हुआ

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शून्य लागत खेती के जनक हैं सुभाष पालेकर

रासायनिक पदार्थों की मदद से 1970 के दशक में भारत में हरित क्रांति की शुुरूआत तो हो गई, लेकिन अब नकारात्मक नतीजे देखने को मिल रहे हैं। पैदावार गिर रही है और खेत की जमीन बंजर हो रही है। ऐसे में किसान की समस्या का एक ही समाधान दिखता है और वो है शून्य लागत वाली खेती जिसे जीरो बजट खेती भी कहते हैं।

जीरो बजट खेती की नींद रखने वाले किसान सुभाष पालेकर ने इसे करीब 30 साल पहले खोजा था। आज इस तकनीक को करीब 40 लाख किसान भारत और विदेशों में इस्तेमाल कर रहे हैं।

जीरो बजट खेती के बूते ही किसान के खेत का उत्पादन दोगुना हो चुका है। इसके करने के लिए सिर्फ 1 गाय खेत पर पालने की जरूरत है, जो कि आपके 30 एकड़ के खेत पर जीरो बजट खेती करवा सकती है।

दरअसल, गाय के 1 ग्राम गोबर में अनगिनत छोटे जीव होते हैं। फसल के लिए अहम 16 विभिन्न तत्वों की पूर्ति ये छोटे जीव ही करते हैं। इस देसी तकनीक में छोटे जीवों की खेत की मिट्टी में संख्या बढ़ाई जाती है, ताकि वो फसलों के लिए खुद ही भोजन बनाने लगे। जबकि रासायनिक पदार्थ वाली खेती में फसल को भोजन देना पड़ता है। इस तकनीक में पानी और खाद की 90 प्रतिशत तक बचत होती है।

विदेशों में भी लोकप्रिय है पालेकर का प्रयोग

शून्य लागत खेती के जनक सुभाष पालेकर
शून्य लागत खेती के जनक सुभाष पालेकर

महाराष्ट्र के अमरावती जिले में रहने वाले सुभाष पालेकर ने साल 1988 से 1995 तक जीरो बजट खेती पर कई प्रयोग किए।

जब इससे उन्हें चौंकाने वाले परिणाम मिले, तो पालेकर ने जीरो बजट खेती को जन आंदोलन में बदलने का फैसला कर लिया।

30 साल की मेहनत के बाद अब पालेकर की वेबसाइट से देश ही नहीं बल्कि अमेरिका के साथ साथ अफ्रीका और एशिया के कई देशों के प्रगतिशील किसान जीरो बजट तकनीक सीखकर, इसे इस्तेमाल कर रहे हैं।

शून्य लागत खेती के चरण

शून्य लागत खेती के जनक सुभाष पालेकर
शून्य लागत खेती के जनक सुभाष पालेकर

1- बीजामृत तैयार करना : सबसे पहले बीज का अमृत यानी बीजामृत तैयार किया जाता है। इसके लिए एक घोल बनाया जाता है जिसमें 5 लीटर गोमूत्र, 50 ग्राम चूना, 5 किलो देशी गाय का गोबर, एक मुट्ठी पीपल के नीचे या मेड़ की मिट्टी को 20 लीटर पानी में मिलाया जाता है और इसे 24 घंटे तक रखा जाता है।

फिर दिन में 2 बार इसे लकड़ी से हिलाकर बीजामृत तैयार कर लिया जाता है। फिर करीब 100 किलो बीज का उपचार करने के बाद खेत में बीज बो दिए जाते हैं। इस प्रक्रिया को अपनाने से खेत में DAP और NKP समेत छोटे पोषक तत्वों की पूर्ति की जाती है। साथ ही इससे कीटरोग लगने की संभावना भी लगभग खत्म हो जाती है।

2- जीवामृत : इसमें भी एक घोल बनाया जाता है जिसमें 1 से 2 किलो गुड़, 1 से 2 किलो दलहन आटा, 5 से 10 लीटर गोमूत्र, 10 किलो देशी गाय का गोबर और एक मुट्ठी जीवाणुयुक्त मिट्टी को 200 लीटर पानी में मिलाया जाता है।। इसके मिलाकर एक ड्रम में जूट की बोरी से ढक दें। 2 दिन बाद जीवामृत को टपक सिंचाई के साथ इस्तेमाल करें। इस जीवामृत को स्प्रे के तरीके से भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

3- घन जीवनामृत :

इसमें 1 किलो दलहन आटा, 100 किलो गोबर, 1 किलो गुड़ और 100 ग्राम जीवाणुयुक्त मिट्टी को 5 लीटर गोमूत्र में मिलाकर पेस्ट बनाया जाता है। फिर 2 दिन तक छाया में सुखाया जाता है। इसके बाद इसे बारीक करके बोरी में भर दिया जाता है। एक कुंटल प्रति एकड़ की दर से बुवाई की जाती है। इससे फसल की पैदावार दोगुनी तक बढ़ने की संभावना हो जाती है।

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