Coated Seeds Raipur Agriculture University

खुशखबरी ! हो गई शुरुआत देश में नई हरित क्रांति की, अब खेत में बीज नहीं बल्कि ‘गोली’ से पैदा होगी फसल

ताजा ख़बर नई तकनीक सरकारी योजना

रायपुर की कृषि यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने खोज निकाली नई तकनीक

1960 और 1970 के दशक में भारत ने पहली बार हरित क्रांति की शुरुआत हुई और देखते ही देखते गरीब देश जाने वाला भारत अपने अन्न से दुनिया की भूख मिटाने लगा। अब दूसरी हरित क्रांति की शुरुआत भी हो चुकी है, लेकिन इस बार नई हरित क्रांति को लाने का सहरा बंधेगा रायपुर की कृषि यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के सर पर।

आमतौर पर घाटे का सौदा मानी जाने वाली खेती अब किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगी। खाद-बीज की बढ़ती महंगाई की वजह से खेती से विमुख हो रहे किसानों के लिए अच्छी खबर है कि वे फसल के बीज गोली के रूप में बोएंगे और अच्छा उत्पादन लेंगे।

रायपुर की इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक ने एक नई तकनीक ईजाद की है। इसमें तिलहन, धान और दलहन के बीजों पर कीटनाशक और उर्वरक का आवरण चढ़ाकर उसकी उत्पादन क्षमता बढ़ायेंगे। इसके साथ ही इससे शारीरीक मेहनत और लागत में भी कमी आएगी।




फसलों के उत्‍पादन में होगी बढ़ोतरी

कृषि वैज्ञानिक इस नई हरित क्रांति की शुरुआत मान रहे हैं। तकनीक के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से किसानों और देश को बड़ा आर्थिक लाभ होगा। एक तरफ जहां देश के हजारो करोड़ रुपए बचेंगे, वहीं इस तकनीक से फसलों के उत्पादन में करीब 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होगी।

इस तकनीक में पहले फफूंद नाशक का आवरण बीज के ऊपर चढ़ाया जाता है। इसके बाद रसायन और खाद का आवरण भी चढ़ाया जाता है। इस तकनीक से तैयार बीज के अंकुरण की ताकत ज्यादा होती है।

आमतौर पर बुआई के समय साधारण बीज खेतों में अधिक गहराई तक चले जाते हैं। इससे करीब 20 से 30 प्रतिशत बीजों का अंकुरण नहीं होता और मिट्टी के अंदर ही सड़कर बेकार हो जाते हैं। जबकि नई कोटिंग तकनीक में बोता पद्धति में 30 प्रतिशत और कतार बोनी में 20 प्रतिशत बीजों की ज्यादा बचत होती है।




पेलेटिंग तकनीक के फायदे

  1. बीज का अंकुरण ज्यादा होता है।
  2. बीज और खाद की बचत 25 से 30 प्रतिशत तक होती है।
  3. उर्वरक कम डालने से खेतों में प्रदूषण कम होता है।
  4. बीज में कीड़े लगने का खतरा खत्म हो जाता है।
  5. बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से देश की उर्वरक-सब्सिडी का हजारों करोड़ों रुपए बचेगा।

कृषि वैज्ञानिक डॉ.एसके टांक के मुताबिक टीम इस तकनीक पर करीब 7 साल से काम कर रही हैं। इसका सफल परीक्षण हो चुका है। अब इसे एक साल में किसानों तक पहुंचाने की योजना है।

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