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इन किसानों को नहीं सूखे और ज्यादा बारिश से चिंता, करते हैं अनोखे ढंग से खेती

इंटरव्यू ताजा ख़बर नई तकनीक

कम या ज्यादा बारिश दोनों सूरतों में ही करते हैं बैगा खेती

हर साल देश के कुछ हिस्सों में कहीं सूखा पड़ता है तो कहीं बाढ़ आती है। लेकिन छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कोरवा आदिवासियों को इसका कोई डर नहीं है। क्योंकि इनके पास है बेवर खेती की सदियों से चली आ रही देसी तकनीक।

बेवर खेती में जमीन को जोता नहीं जोता और 56 तरह के पारंपरिक बीजों की मदद से खेती की जाती है। इस देसी तकनीक में ना बाढ़ का असर पड़ता है और ना ही सूखे का। इसमें इतनी फसल हो जाती है कि किसान का गुजारा हो जाए।

किसान नान्हू रठुरिया के मुताबिक इस तकनीक में खेत को जोता नहीं है। बल्कि पहले छोटी और बड़ी झाड़ियों को जला दिया जाता है। फिर आग के ठंडा होने के बाद खेत में करीब 16 अलग अलग तरह के अनाज, सब्जियां और दलहन के बीज बो दिए जाते हैं। ये बोज बिज होते हैं जो कम या ज्यादा बारिश दोनों में ही उग जाते हैं। इसके अलावा इस देसी तकनीक में ना खाद की जरूरत होती है और ना ही पेस्टीसाइड्स की।

बैगा महापंचायत के नरेश बिश्वास के मुताबिक बेवर तकनीक ना केवल मिनिमम खाने की गारंटी किसान को देती है बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी बनाए रखती है। साथ ही हर तीसरे और चौथे साल में बेवर खेती के लिए नए खेत में खेती की जाती है।

बेवर खेती की ख़ास बातें

जब देश गुलाम था तब ब्रिटिश सरकार ने जंगल की कटाई रोकने के नाम पर बेवर खेती को बैन कर दिया था। लेकिन 1972 में भारतीय वन कानून बनने के लिए इस बैन को वापस ले लिया गया।

अब मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले में 7 गांवों में बेवर खेती होती है। करीब 2336 एकड़ इलाके में इस खेती से किसान अपना गुजर बसर करते हैं।

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