October 13, 2016

असली हीरो देखने हैं तो फिल्म नहीं बल्कि देश के गांव-देहातों में आइए, जहां आपको ऐसे ऐसे किसान मिलेंगे जो सबकुछ लुट जाने के बावजूद अपनी कड़ी मेहनत और थोड़ी सी समझदारी से खोया हुआ अपना सबकुछ दोबारा हासिल कर लेते हैं।

ऐसे ही हीरोज में से एक हैं बिहार के किसान परशुराम दास। गांव चापर के रहने वाले परशुराम पैसे की तंगी की वजह से 12वीं से आगे पढ़ नहीं सके। कम उम्र में ही शादी ने परिवार की देखभाल का बोझ भी बढ़ा दिया। ऊपर से पुश्तैनी खेती की जमीन के नाम पर घर में सिर्फ 1 एकड़ खेत ही मिला। यानी दिक्कतें ही दिक्कतें।

परशुराम की जिंदगी में अभी और दिक्कतें आने वाली थीं। 2011 से पहले तक उन्होंने गेंहू, चावल, मक्का, सबकुछ करके देख लिया। लेकिन ठेले भर का भी लाभ नहीं मिला उनको।

परशुराम करना बहुत कुछ चाहते थे लेकिन कम पढ़ाई और पैसे की तंगी ने हिम्मत तोड़ने का ही काम किया। रही सही कसर, फसलों की बर्बादी ने पूरी कर दी। हालात ये हो गए कि जो 1 एकड़ खेत परिवार के पास था वो भी गिरवी रखना पड़ा ताकि बच्चों का पेट भर सकें।

तभी परशुराम की मुलाकात एक दूसरे गांव सधुआ के किसान उमेश मंडल से हुई। उमेश पहले से ही पपीते की खेती करके लाभ कमाते रहे थे, लेकिन उनकी परिवार और आर्थिक हालत परशुराम जैसी खराब नहीं थी।




खैर परशुराम ने उमेश से पपीते की खेती का तरीका इत्यादि सीखा और 2011 में जिंदगी का सबसे बड़ा रिस्क ले लिया। उन्होंने अपने गिरवी पड़े खेत को खुद ही किराए पर लिया और पपीते की खेती शुरु कर दी। पहली कोशिश में किस्मत ने फिर धोखा दिया और फसल बेकार हो गई।

लेकिन परशुराम ने असल जिंदगी के हीरो की तरह हिम्मत नहीं हारी और फिर से कोशिश की। इस बार नतीजे इतने जबरदस्त आए कि आसपास के इलाके में उनके खूब चर्चे हो गए। रातों रात वो बाकी किसानों के लिए हीरो बन गए।

दूसरी कोशिश में परशुराम ने 1 एकड़ खेत में पपीते की खेती से 5 लाख रूपए का शुद्ध लाभ कमाया। दूसरे-तीसरे साल भी ऐसा ही लाभ हुआ। नतीजा, उन्होंने अपनी गिरवी पड़ी जमीन भी छुड़ा ली। यानी जो किसान और उसका परिवार 2 वक्त की रोटी के लिए भी तरसने लगा था वो अब मालदार हो गया।




अब स्थिति ये है कि आसपास के लोगों को परशुराम पपीते की खेती में मदद करके उनकी भी आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद कर रहे हैं।

किसान परशुराम ने पूसा नन्हा, रेड लेडी और चड्ढा सिलेक्शन जैसे उन्नत किस्म के पीपीते की प्रजाति का इस्तेमाल किया है।

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साभार – कृषि जागरण

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Vandana Singh
वंदना सिंह को पत्रकारिता का 10 साल का अनुभव है