August 10, 2016 Fishing at home

अगर आपको लगता है कि मछली पालन का सिर्फ गांव के तालाब या नदी में ही किया जा सकता है तो आप गलत है। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आप पूरी गलत है। ICAR की एक विशेष योजना ने अब लोगों को मछलियां का पालन घर पर ही करने की सुविधा कर दी है।

शोभाकारी मछलियों की डिमांड

सौंदर्य संबंधी आनंद और भाग्‍यशाली होने के विश्‍वास, तनाव को कम करने तथा अन्‍य कारणों से राष्‍ट्रीय तथा अंतरराष्‍ट्रीय बाजारों में शोभाकारी मछलियों की मांग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इस क्षेत्र में शोभाकारी मछलियों के पालन में लगे लोगों की संख्‍या प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। चाहे यह शौक के लिए हो या सौंदर्य प्रेम के लिए हो या वित्‍तीय लाभ के लिए, अनेक लोग शोभाकारी मछली पालन को व्यासायिक स्‍तर पर अपना रहे हैं।

इसके लिए बहुत आसान तकनीक उपलब्‍ध होने की वजह से गांव-देहात में लोगों को कम समय में अतिरिक्त कमाई करने का अच्छा मौक मिल रहा है। अच्छी बात ये है कि इसे घर की महिलाएं भी खाली समय में कर सकती है।

Fishing at home
Fishing at home

चित्रदुर्ग जिले में हो रहा है घरों में मछलीपालन

शोभाकारी मछली पालन खेतिहर महिलाओं के लिए एक नई तकनीक है जिसमें समय और निवेश कम लगता है लेकिन लाभ अधिक होता है और इसके साथ ही जल की उत्‍पादकता में भी वृद्धि होती है। कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में राष्‍ट्रीय कृषि नमोन्‍मेष परियोजना (NAIP) के लागू होने से पहले किसान शोभाकारी मछली पालन के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे।

IGA के एक अंग के रूप में परियोजना की शुरुआती निवेश से जुड़ी सहायता से शोभाकारी मछली पालन का काम सीमेंट के पक्‍के टैंक बनाकर शुरू किया गया। फिर इनमें शोभाकारी मछलियों (मॉली, गप्‍पी और सॉर्ड टेल) की प्रजातियों का पालन शुरू किया गया।

खेतिहर महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया तथा उन्‍हें बेंगलुरू के आस-पास स्थित कई मछली पालन इकाइयों को भी दिखाया गया। उन्‍हें अपनी मछलियां बेचने का अच्छा बाजार भी दिखाया गया।

ऑरनामेंटल फिश ग्रोवर एसोसिएशन का गठन किया गया जिससे NAIP की सहायता से शुरू हुई 70 ऐसी इकाइयों को शोभाकारी मछलियों के अच्‍छे मूल्‍य मिलना तय हुए।

लागत और कमाई

कर्नाटक फिशरीज़ डवलपमेंट (Karnataka Fisheries Development) या एक्‍वेरियम कॉरपोरेशन (Aquarium Corporation) की दुकानों पर ये शोभाकारी मछलियां 8 रु. प्रति मछली की औसत दर से सीधी बेची गई।

मेलों में खेतिहर महिलाएं या स्‍वयं सहायता समूह से जुड़कर मछलीपालन करने वाले लोग, अपने ग्राहकों को 6 या 8 इंच के प्‍यालों में खाने के 25 ग्राम के एक पैकेट और शोभाकारी जलीय पौधे की एक टहनी के साथ 150 रु. की दर पर बेचते हैं।

500 लीटर के सीमेंट के 2 टैंक में से प्रत्‍येक से प्रति वर्ष 24,634 रु. का सकल लाभ हुआ यानी दो टैंक से करीब 50 हजार रूपए की कमाई हुई। कुल लागत 14,398 रु. प्रति टैंक रही। इसमें दो मजदूरों, फिंगरलिंग, आहार, जल आदि का खर्च भी शामिल है।

कम समय, कम मेहनत और कम जोखिम के साथ खेतिहर महिलाओं को इसके प्रतिवर्ष 10,235 रु. प्रति टैंक का लाभ हुआ। यानी अगर कोई इसे बड़े स्तर पर करना चाहे तो बड़ा फायदा हो सकता है। क्योंकि इसमें करीब 40 प्रतिशत का प्रॉफिट है।

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मोनिका सिंह को पत्रकारिता का 10 साल का अनुभव है